रौद्र रस की परिभाषा एवं उदाहरण / रौद्र रस के उदाहरण व स्पष्टीकरण

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रौद्र रस की परिभाषा एवं उदाहरण / रौद्र रस के उदाहरण व स्पष्टीकरण

रौद्र रस की परिभाषा एवं उदाहरण / रौद्र रस के उदाहरण व स्पष्टीकरण

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रौद्र रस की परिभाषा

काव्य में किसी व्यक्ति के द्वारा क्रोध में किये गये अपमान (शत्रु अथवा अविनीत व्यक्ति की चेष्टाओं, गुरुजनों की निन्दा आदि) से उत्पन्न भाव की परिपक्वावस्था को रौद्र रस कहा जाता है। अर्थात् जहाँ शत्रु या दुष्ट आलंबन के प्रति आश्रय के क्रोध का प्रदर्शन या चित्रण हो वहाँ रौद्र रस होता है।

रौद्र रस के अवयव

1.स्थायीभाव – क्रोध
2.आलम्बन – शत्रु विपक्षी, देशद्रोही, गुरुद्रोही, दुराचारी व्यक्ति |
3.उद्दीपन – कटुवचन, शत्रु के द्वारा किए गए अपराध
4.अनुभाव – नेत्रों का लाल होना, होंठ फड़कना, दांत भींचना
5.संचारीभाव – अमर्ष, मोह, मद, जड़ता, गर्व, स्मृति

रौद्र रस के उदाहरण एवं स्पष्टीकरण

उदाहरण – 1

श्रीकृष्ण के सुन, वचन अर्जुन क्रोध से जलने लगे।
सब शोक अपना भूलकर करतल-युगल मलने लगे ॥
संसार देखे अब हमारे शत्रु रण में मृत पड़े।
करते हुए वह घोषणा वे हो गये उठकर खड़े ॥
उस काल मारे क्रोध के तनु काँपने उनका लगा।
मानो हवा के जोर से सोता हुआ सागर जगा ॥
मुख बाल-रवि सम लाल होकर ज्वाल-सा बोधित हुआ।
प्रलयार्थ उनके मिस वहाँ क्या काल ही क्रोधित हुआ |

स्पष्टीकरण – रस- रौद्र । स्थायी भाव – क्रोध आश्रय- अर्जुन। आलम्बन – कौरव। उद्दीपन-अभिमन्यु का वध अनुभाव- हाथ मलना, घोषणा करना, मुख लाल होना, तनकाँपना। संचारी भाव-उग्रता आदि। अतः यहाँ पर रौद्र रस है।

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उदाहरण – 2

माखे लघन, कुटिल भयी भौंहें ।
रद-पट फरकत नैन रिसौहैं ॥
कहि न सकत रघुवीर डर, लगे वचन जनु बान
नाइ राम-पद-कमल-जुग, बोले गिरा प्रसाद ॥

स्पष्टीकरण – रस- रौद्र स्थायी भाव-क्रोध। आश्रय-लक्ष्मण। आलम्बन – जनक के वचन।उद्दीपन-जनक के वचनों की कठोरता। अनुभाव-भौंहें टेढ़ी होना, ओठ फड़कना,नेत्रों का रिसौंहे होना। संचारी भाव-अमर्ष, उग्रता आदि। अतः यहाँ पर रौद्र रस है।

रौद्र रस के अन्य उदाहरण

(1) श्रीकृष्ण के सुन वचन अर्जुन क्षोभ से जलने लगे।
सब शील अपना भूल कर करतल युगल मलने लगे।
संसार देखे अब हमारे शत्रु रण में मृत पड़े।
करते हुए यह घोषणा वे हो गए उठ कर खड़े ॥

(2) अतिरस बोले बचन कठोर।
     बेगि देखाउ मूढ़ नत आजू ।
      उलटउँ महि जहँ लग तवराजू ।।

(3) जो राउर अनुशासन पाऊँ।
       कन्दुक इव ब्रह्माण्ड उठाऊँ ।।
       काँचे घट जिमि डारिऊँ फोरी ।
       सकौं मेरु मूले इव तोरी ॥

(4)  रे नृप बालक कालबस, बोलत तोहि न संभार ।
       धनुही सम त्रिपुरारी धन्, विदित सकल संसार ।।

(5) उस काल मानों क्रोध से, तन कापने उनका लगा।
      मानो हवा के जोर से, सोता हुआ सागर जगा ।।

(6) रे नृप बालक कालबस, बोलत तोहि न संभार।
     धनुही सम त्रिपुरारी धनु, विदित सकल संसार।।

(7) प्रभु हो या परात्पर हो
    कुछ भी हो सारा तुम्हारा वंश
   इसी भाँति पागल कुत्ते की तरह
   एक-दूसरे को परस्पर फाड़ खाएगा
   तुम खुद उनका विनाश करने के कई वर्षों बाद
    किसी घने जंगल में
   साधारण व्याध के हाथों मारे जाओगे
    प्रभु हो पर मारे जाओगे पशुओं की तरह।

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(8) सुनत लखन के बचन कठोर। परसु सुधरि धरेउ कर घोरा।।
    अब जनि देर दोसु मोहि लोगू। कटुबादी बालक बध जोगू।।

(9) समाचार कहि जनक सुनाए। जेहि कारन महीप सब आए।
       सुनत बचन फिरि अनत निहारे देखे चाप खंड महि डारे।
      असि रिस बोले बचन कठोर। कहु जड़ जनक धनुष के तोरा।।

                        ★★★ निवेदन ★★★

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