शांत रस की परिभाषा एवं उदाहरण / शांत रस के उदाहरण व स्पष्टीकरण

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शांत रस की परिभाषा एवं उदाहरण / शांत रस के उदाहरण व स्पष्टीकरण

शांत रस की परिभाषा एवं उदाहरण / शांत रस के उदाहरण व स्पष्टीकरण

चलिए अब समझते है – शांत रस किसे कहते हैं,शांत रस के उदाहरण,शांत रस के सरल उदाहरण,शांत रस का स्थायी भाव,शांत रस की परिभाषा एवं उदाहरण / शांत रस के उदाहरण व स्पष्टीकरण

शान्त रस की परिभाषा

काव्य में जहाँ किसी भी भौतिक पदार्थ या व्यक्ति के प्रति लिप्सा या उद्योग के पूर्ण रहित भाव का चित्रण होता है, वहाँ शांत रस होता है।

शान्त रस के अवयव

1.स्थायीभाव –  निर्वेद
2.आलम्बन – ईश्वर चिन्तन, संसार की असारता
3.आश्रय – ज्ञानी व्यक्ति
4.उद्दीपन – सत्संग, दार्शनिक ग्रन्थों का पठन आदि
5.संचारी – ग्लानि, उद्वेग, दैन्य, जड़ता ।

शान्त रस के उदाहरण एवं स्पष्टीकरण

उदाहरण – 1

बुद्ध का संसार त्याग-
क्या भाग रहा हूँ भार देख?
तूम मेरी ओर निहार देख-
मैं त्याग चला निस्सार देख
अटकेगा मेरा कौन काम।
ओ क्षणभंगुर भव! राम-राम!
रूपाश्रय तेरा तरुण गात्र,
कह, कब तक है वह प्राण मात्र ?
भीतर भीषण कंकाल मात्र,
बाहर-बाहर है टीमटाम।
ओ क्षणभंगुर भव! राम-राम !

स्पष्टीकरण – रस–शान्त। स्थायी भाव-निर्वेद । आश्रय – गौतमबुद्ध। आलम्बन-निस्सार और क्षणभंगुर संसार। उद्दीपन-सांसारिक विषयों की क्षणभंगुरता, विद्रुप परिणाम और निस्सारिता का बार-बार ध्यान आना। अनुभाव-संसार को त्याग कर घर से निकल जाना। संचारी भाव-मति, वितर्क, धृति । अतः यहाँ पर शांत रस है।

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उदाहरण – 2

समता लहि सीतल भया, मिटी मोह की ताप ।
निसि-वासर सुख निधि लह्या, अंतर प्रगट्या आप ॥

स्पष्टीकरण – रस – शान्त। स्थायी भाव-शम । अतः यहाँ पर शांत रस है।

उदाहरण – 3

अपुनपो आपुन ही में पायो।
सबद-हि-सबद भयो उजियारो, सतगुरु भेद बतायो ।
ज्यों कुंडल नाभी कसतूरी, ढूँढ़त फिरत भुलायो ।
फिर चितयो जब चेतन ह्वा, करि आपुनहो में पायो ।
सपने माँहि नारि को भ्रम भयो, बालक कहूँ गमायो॥
जागि लख्यो ज्यों-को-त्यों ही है, ना कहुँ गयो न आयो ॥
सूरदास, समुझे की यह गति, मन-ही-मन मुसकायो ।
कही न जाय या सुख की महिमा, ज्यों गूँगे गुर खायो ।

स्पष्टीकरण – रस – शान्त । स्थायी भाव – शम। आश्रय-साधक। आलम्बन -आत्मज्ञान । अनुभाव-मन-ही-मन मुसकाना । संचारी भाव-धृति । अतः यहाँ पर शांत रस है।

उदाहरण –4

अब लौं नसानी अब न नसैहौं ।
राम कृपा भव निसा सिरानी जागे फिर न डसैहौं ॥
पायो नाम चारु चिंतामनि उरकर तें न खसैहौं ।
स्याम रूप सुचि रुचिर कसौटी चित कंचनहिं कसैहौं ।
परबस जानि हँस्यों इन इन्द्रिन निज बस ह्वै न हँसैहौँ ।
मन मधुकर पन करि तुलसी रघुपति पद कमल बसैहौं ॥

स्पष्टीकरण – यहाँ निर्वेद स्थायी भाव है। सांसारिक असारता और इन्द्रियों द्वारा उपहास उद्दीपन है। स्वतन्त्र होने तथा राम के चरणों में रति होने का कथन अनुभाव है। धृति, वितर्क, मति आदि संचारी भाव हैं। इन सबसे पुष्ट निर्वेद शान्त रस को प्राप्त हुआ है।

शांत रस के अन्य उदाहरण

(1) बन बितान रवि ससि दिया फल भख सलिल प्रवाह।
    अवनि सेज पंखा पवन अब न कछू परवाह ॥

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(2) देखी मैंने आज जरा।
     हो जावेगी क्या ऐसी मेरी ही यशोधरा ।
     हाय! मिलेगा मिट्टी में वह वर्ण-सुवर्ण खरा ।
     सूख जावेगा मेरा उपवन जो है आज हरा।

(3) गन पछितैहे अवसर बीते।
   दुर्लभ देह पाइ हरि पद भजु, करम वचन अरू रीते।।

(4) मन रे तन कागद का पुतला।
    लागै बूँद बिनसि जाय छिन में, गरब करै क्या इतना ।।

(5) गुरू गोविन्द तो एक हैं, दूजा यह आकार ।
     आपा मटि जीवति मरै, तो पावे करतार ।।







                          ★★★ निवेदन ★★★

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