भक्ति रस की परिभाषा एवं उदाहरण / भक्ति रस के उदाहरण व स्पष्टीकरण

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भक्ति रस की परिभाषा एवं उदाहरण / भक्ति रस के उदाहरण व स्पष्टीकरण

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चलिए अब समझते है – भक्ति रस किसे कहते हैं,भक्ति रस के उदाहरण,भक्ति रस के सरल उदाहरण,भक्ति रस का स्थायी भाव,भक्ति रस की परिभाषा एवं उदाहरण / भक्ति रस के उदाहरण व स्पष्टीकरण

भक्ति रस की परिभाषा

ईश्वर या अन्य किसी अलौकिक महिमायुक्त सत्ता के प्रति
अनुरागयुक्त पूर्ण समर्पण भावना का जो चित्रण होता है वहाँ
भक्ति रस की स्थिति मानी जाती है। भक्ति रस का स्थायी भाव ईश्वरानुराग बताया गया है। यहाँ ईश्वर का व्यापक अर्थ में प्रयोग समझना चाहिए।

भक्ति रस के उदाहरण एवं स्पष्टीकरण

उदाहरण – 1
जाको हरि दृढ़ करि अंग कर्यो ।
सोइ सुसील, पुनीत, बेद-बिद विद्या-गुननि भर्यो ।
उतपति पांडु-सुतन की करनी सुनि सतपंथ डर्यो ।
ते त्रैलोक्य-पूज्य, पावन जस सुनि-सुन लोक तर्यो ।
जो निज धरम बेद बोधित सो करत न कछु बिसर्यो ।
बिनु अवगुन कृकलासकूप मज्जित कर गहि उधर्यो ।

स्पष्टीकरण – रस-भक्ति। स्थायी भाव-देव के प्रति भक्तिभाव । आश्रय-स्वयं कवि । आलम्बन – श्रीराम उद्दीपन- श्रीराम की दयालुता, भक्त के प्रति वत्सलता। अनुभाव- श्रीराम की महिमा (गुणों) का कथन । संचारी भाव- हर्ष, स्मृति आदि । अतः यहाँ पर भक्ति रस है।

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भक्ति रस के अन्य उदाहरण

( 1 ) नैनन्हि की करि कोठरी, पुतली पलंग बिछाय।
      पलकन्ह की चिक डारि कै, पिय को लिया रिझाया।

(2) जाको हरि वृढ़ करि अंग कर्यो ।
    सोइ सुसील, पुनीत, बेद-बिद विद्या-गुननि भर्यो ।
     उतपति पांडु-सुतन की करनी सुनि सतपंथ डर्यो ।
    ते त्रैलोक्य-पूज्य, पावन पज सुनि-सुन लोक तर्यो ।।
    जो निज धरम बेद बोधित से करत न कछु बिसर्यो।
    बिनु अवगुन कृकलासकूप मज्जित कर गहि उधर्यो।

(3) उलट नाम जपत जग जाना।
     बाल्मीकि भए ब्रह्म समाना।।

(4) राम जपु, राम जपु, राम जपु, बावरे,
      घोर भव नीर निधि नाम निज नांव रै।

(5) प्रभु जी तुम चंदन हम पानी,
     जाकी गंध अंग-अंग समाही।

(6) ना किछु किया न करि सक्या, ना करण जोग सरीर।
    जो किछु किया सो हरि किया, ताथै भया कबीर कबीर।

(7) राम-नाम छाड़ि जो भरोसो करै और रे।
     तुलसी परोसो त्यागि माँगै कूर कौन रे।।

(8) रामनाम गति, रामनाम गति, रामनाम गति अनुरागी।
     ह्वै गए, हैं जे होहिंगे, तेई त्रिभुवन गनियत बड़भागी।।

(9) मेरे तो गिरधर गोपाला, दूसरो ना कोई।
     जाके सर मोर मुकुट, मेरो पति सोई।।

(10) जब-जब होइ धरम की हानी।
     बाहिं असुर अधम अभिमानी।।
     तब-तब प्रभु धरि मनुज सरीरा।
    हरहिं कृपा निधि सज्जन पीरा।।

                          ★★★ निवेदन ★★★

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